मथुरा की ब्रज की होली की तरह ही प्रसिद्ध है सहरसा के बनगांव की होली।

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होली त्योहार का एक अलग अपना महत्व है जहां एक दूसरे को रंग गुलाल लगाकर होली का त्योहार घूम धाम से मनाते है। संत लक्ष्मीनाथ गोसाई द्वारा आयोजित होली की परंपरा आज भी इस गांव में परम्परागत तरीके से मनाते है। 18वी सदी से चली आ रही परंपरा आज भी जीवित है यहां गांव के सभी लोग इकट्ठा होकर एक साथ होली खेलते है । यहां खेले जाने वाली होली में जाती धर्म का भेद नहीं रहता हिन्दू और मुस्लिम साथ साथ होली का त्योहार मनाते हैं। होली के दिन में गांव के लड़के अलग अलग टोली बनाकर निकलते है और एक दूसरे के कंधे पर चढ कर होली का त्योहार मनाते है। इस दौरान महिलाएं छत पर से पानी में रंग डालकर छत से नीचे फेकती हैं। गांव के लोग कुछ चिन्हित स्थानों पर इक्कठे होकर बिना बनियान पहने के होली खेलते है।

भगवती स्थान के पास इक्कठे होकर खेली जाती है हुरदंग होली।

गांव के युवा हो या बुजुर्ग टोली बनाकर समूह में एक दूसरे के कंधे पर बैठकर भगवती स्थान के पास पहुंचते है। जहां पानी और रंग के साथ हुरदंगी होली खेली जाती है। इस दौरान पानी में रंग डालकर एक दूसरे के ऊपर रंगो की बोछर की जाती है। गांव के सभी लोग इस स्थान पर इक्कठे होकर एक साथ होली मानते है जो देखने में बहुत ही मनोरम लगता है। भगवती गीत और मंदिर में पूजा कर शाम को होली का समापन किया जाता है।

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