आज पूरे मिथिलांचल में धूमधाम से मनाया जा रहा जूड़-शीतल का त्योहार, आइए जानते है जूड़-शीतल क्यो है खास।

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मिथिला की संस्कृति से जुड़ा हुआ त्योहार जूड़-शीतल बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। मालूम हो कि कृषि प्रधान देश होने के कारण भारत में कई धार्मिक त्योहार किसानों से जुड़ा हुआ है। जहां रबी फसलों की कटाई के मौके पर वैशाखी पर्व मनाते है, वहीं पूरे बिहार में जूड़-शीतल के नाम से यह प्रसिद्ध है। जिसे बिहार के साथ विशेष रूप से मिथिलांचल में खास तौर पर लोग इसको मनाते है।

बासी पानी से बुजुर्गों द्वारा जुड़ाया जाता

मालूम हो कि दो दिन का यह लोकपर्व है, जहां जूड़-शीतल के पहले दिन सतुआइन मनाया जाता है। जिसमें सत्तू और बेसन से बने व्यंजनों को खाया जाता है। वहीं बचे हुए बासी खाने को अगले दिन भी खाते है। इस दिन घर के बुजुर्ग सभी छोटे के सिर पर बासी पानी डालते है। माना जाता है कि ऐसा करने से पूरे गर्मी के मौसम में दिमाग ठंडा रहेगा। साथ ही जीव-जंतु, पेड़-पौधों के जड़ों में पानी सींचा जाता है। जिसके बाद स्वादिष्ट भोजन बनाकर खाते हैं।

संस्कृति से जुड़ा हुआ है त्योहार

बताते चलें कि मिथिला में अलग-अलग रूपों में प्रकृति की पुजा की जाती है। यह हमारी संस्कृति से जुड़ा हुआ त्योहार है। जो विलुप्त होने के कगार पर है। गांवों में अभी भी इसकी झलक मिल जाती है। परन्तु शहरों मे जूड़-शीतल का पर्व लगभग खत्म हो चुका है। इक्का-दुक्का घरों में ही देखने को मिलता है। माना जाता है कि जिस प्रकार पोखर, कुंआ, गड्ढों की सफाई के बाद नये जल का आगमन होगा। वहीं समाज के सभी वर्गों में मेल-मिलाप बढ़ेगा।

पारंपरिक ढंग से होता है पुजा-पाठ

वेदों, पुराणों एवं शास्त्रों के मुताबिक जब सूर्य मकर संक्रांति से मेष संक्रान्ति में प्रवेश करता है तो इस दिन को जूड़-शीतल के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन पारंपरिक ढंग से पुजा-पाठ करना चाहिए। कुल देवता को सत्तु, गुड़ और आम के टिकोले का भोग लगाया जाता है। बता दें कि इसी बहाने लोग फसल बोने से लेकर कटाई करने के बीच अपनी मेहनत पर आनंदित होते है। इस त्योहार का महत्व गर्मी की तपिश और पानी से जुड़ा हुआ है।

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