देव भूमि है मधेपुरा स्थित बाबा सिंघेश्वर स्थान

0
1616

मधेपुरा। कोशी की धरती देव भूमि है। कोशी में कई प्राचीन मंदिर है उनमें से एक मधेपुरा में स्थित भगवान शिव का प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर मधेपुरा जिला मुख्यालय से 16 किमी स्थित है जहा बिहार समेत पड़ोसी देश नेपाल से भी श्रद्धालु बाबा के दर्शन के लिए आते है। बिहार का बाबा धाम कहते है बाबा सिंघेश्वर स्थान को। सावन के महीने में बाबा को जल चढ़ाने के लिए लोग कावड़ ऐसी मान्यता है कि इस स्थान पर भगवान शिव का दिव्य शिवलिंग स्थापित है जो ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व रखता है. कहा जाता है कि सिंघेश्वर देश का पहला धार्मिक स्थल है जहां स्वंय भगवान विष्णु ने मंदिर का निर्माण कराया था।
कहा जाता है कि यह धार्मिक स्थान महान श्रृंगी ऋषि का तपोभूमि हुआ करता था।इस स्थान पर यज्ञ के अवसर पर श्रृंगी ऋषि भगवान् शिव की पूजा करते थे।उस समय यहाँ सात हवन कुंड का निर्माण किया गया था।जो आज भी खंडहर के रूप में प्रतीत होता दिखाई देता है।श्रृंगी ऋषि के यहाँ निवास करने के कारण ही कालान्तर में यह सिंघेश्वर स्थान हो गया।

यह स्थान पौराणिक कालों में मूर्ति पूजा के लिए पसिद्ध रहा है।पंडित झारखंडी झा ने भागलपुर दर्पण में इस स्थान की धार्मिक पहलुओं का महिमा मण्डन किया है।कहा जाता है कि पंडित मण्डन मिश्र और शंकराचार्य के बीच विश्व प्रसिद्ध शास्त्रार्थ भी यहीं पर हुआ था।
वराह पुराण में भी उल्लेख है सिंघेश्वर स्थान का
सिंघेश्वर स्थान का सन्दर्भ वराह पुराण में भी पाया गया है। उस पुराण के अनुसार इस स्थान पर घना जंगल हुआ करता था।कई मवेशी यहाँ घास चरने आया करते थे उन मवेशियों में एक ऐसी भी गाय थी जो घास चरने के क्रम में एक ख़ास स्थान पर खड़ी होकर अपनी स्तन से प्रति दिन दूध गिरा देती थी।यह प्रति दिन की घटना थी प्रति दिन वह गाय वहां आकर अपनी स्तन (थन) से उसी जगह पर दूध गिरा देती थी। लोग यह देख कर अचंभित थे।

एक दिन लोगों ने उस स्थान को खोदा जहां से एक शिव लिंग मिली।लोगों ने उसी दिन से उस शिव लिंग की पूजा करनी शुरू कर दी।फिर धीरे-धीरे उस स्थान पर एक शिव मंदिर बन कर तैयार हो गया जो आगे चल कर सिंघेश्वर स्थान कहलाया।मंदिर बनबाने बाला भागलपुर का एक व्यापारी था जिसका नाम हरि चरण चौधरी था।

सिंघेश्वर स्थान है विष्णु द्वारा स्थापित
वराह पुराण में एक दूसरी कथा भी है जो इस प्रकार है – एक बार भगवान विष्णु,भगवान् ब्रम्हा और भगवान् इंद्र,देवों के देव महादेव से एक महत्वपूर्ण वैश्विक घटना के पहलू पर विचार विमर्श करने कैलाशपुरी गए लेकिन भगवान् शिव अपने नन्दीश्वर के साथ कैलाशपुरी से कहीं अज्ञात जगह चले गए थे शिव को वहां न पाकर वे मायूस हो गए ।

इधर शिव अपने नन्दीश्वर के साथ एक जंगल में ध्यान करने चले गए थे अपने नंदी को एक जगह बैठाकर घने जंगल में ध्यान करने लगे साथ ही उसने नन्दीश्वर को बता दिया था कि मेरे बारे में किसी को पता नहीं चलना चाहिए कि मैं यहाँ ध्यान में लीन हूँ ऐसा ही हुआ नन्दीश्वर एक जगह बैठ कर पहरेदारी करने लगा ब्रम्हा,विष्णु और इंद्र शिव को खोजते-खोजते वहां पहुंच गए नन्दीश्वर से शिव का पता पूछा लेकिन नन्दीश्वर ने उन लोगों को शिव का पता नहीं बताया।

शिव ने तीनों देवगणों को पहचान लिया वे शीघ्र ही एक लम्बे सिंग बाले हिरन के रूप में आ गए तीनों देवों ने भी उस विचित्र लम्बे सींघों वाले हिरन को देखकर शिव को पहचान लिया वे लोग उस हिरन को पकड़ने दौड़े इंद्र ने सिंग के उपरी भाग को पकड़ा,ब्रम्हा ने बीच भाग को जबकि विष्णु ने सिंग के जड़ को पकड़ा अब तीनों देवगण बहुत ही ताकत के साथ हिरन को अपनी ओर खींचा फिर एकाएक वह हिरन गायब हो गया और स्वर्ग से आकाशवाणी हुई कि तुम लोग भगवान शिव को पाने में असमर्थ हो।

इंद्र के हाथ में जो सिंग का भाग था उसे स्वर्ग में इंद्र ने स्थापित कर दिया ब्रम्हा ने भी अपने हिस्से वाले सिंग को स्वर्ग में ही स्थापित कर दिया जबकि विष्णु ने अपने हिस्से वाले सिंग को पृथ्वी पर स्थापित कर दिया।

विष्णु के द्वारा पृथ्वी के जिस स्थान पर सिंग को स्थापित किया गया वही जगह कालान्तर में सिंघेश्वर स्थान कहलाया। यही कारण है कि शिव की पूजा यहाँ वैष्णव संस्कृति से होता है वराह पुराण के अनुसार इसकी दो सीमाएं एक मुन्द्रान्चल शिखर के उत्तर में और एक मुन्ज्वर शिखर के दक्षिण में अवस्थित है
सिंहेश्वर मंदिर स्थित शिवलिंग को कामना लिंग के रूप में पूजा जाता है। राजा दशरथ के लिए श्रृंगी ऋषि ने पुत्रेष्ठि यज्ञ कराया था इसीलिए संतान को चाहत लिए काफी संख्या में श्रद्धालु बाबा के पास आते हैं।

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here