सीतामढ़ी में मिलता है मिथिलानगरी का पर्याप्त साक्ष्य,जाने मिथिला नगरी की खोज कैसे हुई।

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दरभंगा। विदेह की राजधानी मिथिला नगरी के पर्याप्त साक्ष्य सीतामढ़ी और उसके आसपास के इलाकों में मिलते है। जनककाल से लेकर बौद्धकाल सहित विद्यापति के भू परिक्रमा में वर्णित मिथिलानगरी सीतामढ़ी की ओर ही इसारा करता है । उक्त बातें रविवार को महावीर मंदिर न्यास, पटना के शोध एवं प्रकाशन पदाधिकारी पंडित भवनाथ झा ने कही।

मिथिला की खोज पर व्याख्यान

गांधी सदन में आयोजित आचार्य रमानाथ झा हेरिटेज सीरीज के तहत आयोजित मो. शफी स्मृति व्याख्यान में विदेह की राजधानी मिथिला की खोज विषय पर बोलते हुए पंडित झा ने वाल्मीकि रामायण में वर्णित मिथिला के भूगोल की चर्चा की। साथ ही बौद्ध साहित्य के साथ विद्यापति के कालखंड तक मिथिला नगर को लेकर वर्णित साक्ष्य को प्रसूत किया। पंडित झा ने अपने शोध पत्र के माध्यम से यह निष्कर्ष तक पहुँचने की बात कही जिसमें मिहिला परगना ही विदेह की राजधानी मिथिलानगर हो सकती है। कार्यक्रम के मुख्याअतिथि ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय माननीय कुलपति प्रो. सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने कहा कि मिथिलानगर को लेकर जो साक्ष्य रखे गये है वो कई कालखंडों और कई भाषाओं से संग्रहित है ऐसे में इस शोध की प्रामाणिकता को खारिज़ नही किया जा सकता। हमें यह जानकर गर्व की अनुभूति होनी चाहिये कि विदेह की राजधानी मिथिलानगर आज भी हमारे देश मे है बल्कि हमारे पडोस में है। उन्होंने इतिहास के ऐसे पक्षों को आमजन खासकर बच्चो के बीच ले जाने की जरूरत बताई । कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए श्री गजानन मिश्र ने कहा कि वर्तमान जनकपुर में जनककालीन पुरातात्विक साक्ष्य नही मिलते है। कुछ तालाबों की ऐतिहासिकता जरूर दिखाई देती है लेकिन इस शहर का वजूद 1630ई. पहले कही उपलब्ध नही है ऐसे में भवनाथ जी द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य पुरातात्विक और भौगोलिक मानकों से सीतामढ़ी को जनकनगरी के रुप मे अधिक प्रमाणित करता है ।

कार्यक्रम का संचालन संतोष कुमार ने किया

कार्यक्रम का संचालन फाउंडेशन के न्याशी संतोष कुमार ने किया जबकि धन्यवाद ज्ञापन रमणदत्त झा ने दिया। कार्यक्रम में दरभंगा राजपरिवार से बाबू रामदत्त सिंह व बाबू गोपालनन्दन सिंह, बैरिस्टर मो. शफ़ी के भतीजे अवकाश प्राप्त अपर समाहर्ता न्याज़ अहमद, विश्वविद्यालय के कुलसचिव कर्नल निशीथ कुमार राय, डॉ. के.सी. सिंह, डॉ. शम्भू प्रसाद, डॉ. ऐ.के. मिलन, डॉ. मंज़र सुलेमान, डॉ. मित्रनाथ झा, डॉ. अवनींद्र कुमार झा, सुशांत भास्कर, चंद्रप्रकाश, फवाद ग़ज़ाली, मणिभूषण, मुरारी कुमार झा आदि मौजूद थे।

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