देश में पहली बार, शहर की समस्याओं को लेकर सहरसा में आयोजित होने जा रहा है जन समस्या महोत्सव !!अपने स्थापना काल से ही अपने वजूद को ढूंढ रहा सहरसा

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सहरसा में आयोजित होने जा रहा है जनसमस्या महोत्सव जहां शहर की समस्याओं के बीच शहर के नेताओं और जनता के बीच होगा सीधा संवाद । इस कार्यक्रम का मुख्य मकसद शहर से जुड़ी समस्याओं जो वक्त के साथ विकराल रूप ले चुकी है उसपर चर्चा जिसमे शहर के प्रबुद्ध लोगों और नेताओं के बीच सवाल जवाब होगा। इस कार्यक्रम के साथ कई संस्कृति कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे। इस कार्यक्रम का आयोजन सहरसा के वरिष्ठ पत्रकार दादा मुकेश सिंह जो बिहार के एक न्यूज चैनल में अपने शो से एक अलग पहचान बनाई है और शहर की समस्याओं को उजागर करने वाले तापमान के पत्रकार तेजस्वी ठाकुर जो युवाओं में लोकप्रिय और सोशल मीडिया के माध्यम से समय समय पर शहर की समस्याओं को जनता के बीच लाने का काम करते हैं इस कार्यक्रम का आयोजन करेंगे।

अपने अतीत में अपने आज को ढूंढता सहरसा

सहरसा जिला की स्थापना 1 अप्रैल 1954 को हुई थी। 2 अक्टूबर 1972 को इस शहर को कोशी प्रमंडल का मुख्यालय बना दिया गया। तीन जिलों का मुख्यालय होने पर कभी इस जिले को गर्व था लेकिन आज अपनी स्थिति पर आंसू बहा रहा है। सहरसा शहर तो बनता चला गया लेकिन इसके विस्तार के साथ ही धीरे धीरे शहर सिकुड़ता चला गया। शहर की सड़कें इतनी पतली है कि चलना भी मुश्किल है, जाम और अतिक्रमण से परेशान शहर धीरे धीरे बढ़ता रहता है। शहर ऐसे भवर में फसता चला गया की एक दिन परिसीमन के खेल में इससे लोकसभा भी छीन लिया गया। अब यह शहर अपने अस्तित्व को तलाश रहा है। मत्स्यगंधा झील, पेपर मिल, बंगाली बाजार रेल ओवरब्रिज निर्माण, अच्छी सड़के, जाम, स्वास्थ सुविधा, पलायन, एम्स निर्माण मुख्य समस्या है इस शहर की।

अंधेरे में अपने वजूद को तलश्ता शहर, पलायन नगरी के नाम से मशहूर सहरसा का इलाका

सहरसा मंडन मिश्र की भूमि है जहा कहा जाता है की तोतें भी संस्कृत बोलते थे। प्रसिद्ध मां तारा स्थान महिषी में स्थित है। सूर्य मंदिर कांदहा इसी भूमि पर है। देव भूमि होने के बाबजूद भी अपने बजूद को खोता चला गया लेकिन किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया। एक कोशिश की जाए तो पर्यटन की असीम संभावनाएं है, कारू खिरहरी स्थान जो कोशी के तट पर स्थित है इस बड़े टूरिस्ट स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है। शाम के 6 बजते बजते मुख्य शहर के चौक चौराहों पर ऐसा अंधेरा होता है जैसे मानो की किसी गांव में मौजूद हो। लोगो को अंधेरे में रहने की आदत हो गई है। अंधेरे में रहते रहते लोग उम्मीद करना भी भूल चुके हैं। इस शहर की बड़ी आबादी महानगरों की तरफ पलायन कर जाती हैं। बड़ी संख्या में लोग दूसरे प्रदेशों में काम करते है, शहर से उम्मीद करते है अगर यहां इंडस्ट्री होती तो पलायन पर मजबुर होना न पड़ता। शहर की सड़को की हालत ऐसी है जहां जलजमाव, बड़े बड़े गड्ढे, टूटी सड़कें देखने को मिल जाएंगी। लोगो ने सड़को के निर्माण की उम्मीद भी छोड़ दी है।

पेपर मिल, बंगाली बाजार रेल ओवरब्रिज और एम्स निर्माण शहर की मांग

सहरसा अपनी समस्याओं से कभी बाहर निकल नहीं पाया। हर पल एक नई समस्या उत्पन्न होती चली गई। जब शहर में वाहन कम थे तब पेपर मिल जो देश का ऐसा पहला मिल होगा जो बनने के बाद अपने उद्घाटन के इंतजार में पिछले न जाने कितने दशकों से दम तौर चुका है। अब वहां खंडर के अलावा कुछ नहीं बचा। दूसरी जाम की समस्या जो बंगाली बाज़ार में वर्ष 1997 से अब 2019 में कागजों और सपनों की दुनिया से बाहर आकर निर्माण के लिए हर वर्ष लोगो को कई सपने दिखा कर चला जाता है।लेकिन कुछ बात बन नहीं पाती। अब एक ओर बात सहरसा की तो शहर के पानी में आयरन और फ्लोराइड की मात्रा ज्यादा है। बड़े बड़े दावे किए गए थे की हर घर को स्वच्छ पानी उपलब्ध होगा लेकिन ये योजना अाई और कब अंधेरे में गुम हो गई शायद ही इस शहर को याद भी हो।

सहरसा में एम्स निर्माण की जरूरत, बड़ी आबादी गंभीर बीमारियों की शिकार

गांव के लोगो की अपनी कई समस्याएं है स्वच्छता, पलायन, रोजगार, पीने के पानी में आयरन और फ्लोराइड की मात्रा होने के कारण बड़ी संख्या में लोग बीमार होते है जिनके इलाज के लिए शहर का एकमात्र अस्पताल सदर अस्पताल पर निर्भर रहना पड़ता है। अच्छी स्वास्थ सुविधा का होना इस शहर की जरुरत बन गई है। यहां के लोग डायबिटीज और ब्लड शुगर जैसी खतरनाक बीमारियो के जाल में फंसते जा रहे है जिसके इलाज के लिए सुपर स्पेशलिटी अस्पताल का होना जरूरी है। एम्स जैसे महा अस्पताल की जरूरत इस शहर के लोगो को है। कोशी के तटबंध के भीतर आबादी बाढ़ से ग्रसित होने से कई बीमारियो से ग्रसित रहते है, जिनके इलाज के लिए एम्स अस्पताल भी कम पड़ेगा। इस कोशी को मेडिकल रिसर्च केंद्र बनाने की जरुरत है। जहां लोगो का इलाज सही ढंग से हो सके। सहरसा की बड़ी आबादी को इलाज के लिए पटना दिल्ली और अन्य शहरों पर निर्भर रहना पड़ता है।

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