क्यों विशेष है भगवान जगन्नाथ की यात्रा। जानिए एक यात्री की कलम से।

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बनमनखी। बनमनखी से रमेश अग्रवाल जो की एक बहुत अच्छे लेखक भी है और कवि भी ,उन्होंने भगवान जगन्नाथ यात्रा के बारे में बताया है आप खुद को जाने से रोक नहीं पाएंगे। भगवान जगन्नाथ मंदिर पर नीलमणि चक्र आज भी है एक बंदर ने इस चक्र को टेढ़ा किया ..और आज तक यह सीधा नही हुआ।भगवान जगन्नाथ को चावल से बने भात का भोग लगाया जाता है।इसकी विशेषता एक और भी है जहाँ चावल से बना भात खाना एकादशी को वर्जित है वहीं एकादशी को भी यहाँ चावल का भोग लगता है।राजपरिवार के वंशज सोने की झाड़ू रथ के आगे लगाते हैं और मोटे मोटे रस्सो से बंधे इन रथो को खींचते हैं। यह यात्रा नो दिनो मे शायद पुरी होती ..।भगवान सपरिवार विश्राम सप्ताह भर करते फिर लौट आते।लाखों की भीड़ हर साल जुटती पर हादसा नही होता। सरकार उचित प्रबंधन देती ..। समुद्र के किनारे धार्मिक यात्रा के साथ साथ समुद्र स्नान एक सुखद अनुभूति देता। भक्त प्रसाद स्वरूप नारियल जनेऊ मे लपेट मे लपेट कर चढ़ाते और सुमुद्र की लहरें वापस नारियल बाहर फैंकती जिसे प्रसाद
स्वरूप माना जाता।भगवान जगन्नाथ को कलियुग का
सर्वोच्च देव भी कहा गया।..चारो धामों की महिमा चारों यूगो मे अपने अपने काल मे प्रसिद्ध हूई।

दर्शन का सौभाग्य हमे भी प्राप्त हुआ। एक विवाह समारोह मे राजगंगपुर सुंदर गढ़ जिला गया था।मैने माँ को पुरी धाम ले जाने की सोची यह 2011 की बात है।500 किलोमीटर के सफर से सुबह जगन्नाथ धाम पहूँचा।दिनभर रात भर घुमा फिर भूवनेश्वर नंदनकानन चिड़ियाघर शायद नाम है ।भारत का सबसे बड़ा चिड़िया घर घुमकर खुले जंगलों मे शेरों को विचरण करते देखकर कोणार्क मंदिर सांची मंदिर लिंगराज मंदिर जो करीब एक हजार साल पुराना है यह तीर्थाटन कर कोलकाता आया।यहाँ दक्षिणेश्वरी काली ..प्रसिद्ध मंदिर देखकर वापस रात आठबजे रेल से वापसी हुई। अपने यात्रा की टिकटें अपने हिसाब से बनती ..और समयरखकर दो दिन आगे का टिकट बनाता ..खूदा ना खास्ता कोई नई जानकारी मिले और बिन देखे लौट ना आऊँ ..।
रमेश अग्रवाल।
कविताओं और कहानियों का संग्रह पढ़ सकते है,नीचे दिए गए लिंक से।।
Yayawarramesh95.wordpress.com

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