आज निकलेगी भगवान जगन्नाथ की यात्रा। जानिए कैसे हुई थी इसकी शुरुवात

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पूरी (Mritunjay)। भगवान जगन्नाथ को विष्णु का 10वां अवतार माना जाता है, जो 16 कलाओं से परिपूर्ण हैं। पुराणों में जगन्नाथ धाम की काफी महिमा है, इसे धरती का बैकुंठ भी कहा गया है। यह हिन्दू धर्म के पवित्र चार धाम बद्रीनाथ, द्वारिका, रामेश्वरम और जगन्नाथ पुरी में से एक है।आज आशद शुक्ला द्वितिया के मंगल दिवस में, पालकी पर निकलेंगे जग के पालनहार भगवान जगन्नाथ।जगत के नाथ भगवान जगन्नाथ आज अपने भाई बलभद्र जी और बहन सुभद्र जी के साथ रथयात्रा पर निकलेंगे

बारिश-
इस बात पर शायद ही किसी ने गौर किया हो कि भगवान जगन्नाथ देव की रथ यात्रा के दिन बारिश जरूर होती है। आज तक कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि इस दिन बारिश न हुई हो।भगवान की यात्रा का ये उत्सव आषाढ़ शुक्ल पक्ष के दूसरे दिन मनाया जाता है।
नारियल की लकड़ी का रथ-
भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, व सुभद्रा के रथ नारियल की लकड़ी से बनाए जाते है। ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि ये लकड़ी हल्की होती है। भगवान जगन्नाथ के रथ का रंग लाल और पीला होता है। इसके अलावा यह रथ बाकी रथों की तुलना में भी आकार में बड़ा होता है। उनकी यात्रा बलभद्र और सुभद्रा के रथ के पीछे होती है।


जानिए कैसे हुई थी शुरुवात।
राजा इन्द्रद्युम्न, जो सपरिवार नीलांचल सागर (उड़ीसा) के पास रहते थे।इसलिए मनाया जाता है रथ यात्रा
उन्हें समुद्र में एक विशालकाय काष्ठ (लकड़ी) दिखा। राजा उस लकड़ी से भगवान की मूर्ति बनाना चाहते थे। रजा के मन में जैसे ही यह विचार आया की इस सुंदर लकड़ी से जगदीश की मूर्ति बनाई जाए, वैसे ही बूढ़े बढ़ई के रूप में स्वयं विश्वकर्मा जी प्रस्तुत हो गए।
उन्होंने मूर्ति बनाने के लिए एक शर्त रखी कि मैं जिस घर में मूर्ति बनाऊँगा उसमें मूर्ति के पूरी तरह बन जाने तक कोई न आए। राजा ने इसे मान लिया। आज जिस जगह पर श्रीजगन्नाथ जी का मन्दिर है उसी के पास एक घर के अंदर वे मूर्ति निर्माण में लग गए।
राजा के परिवार जनों को यह मालूम न था कि वह बूढ़ा बढ़ई कौन है। कई दिन तक घर का द्वार बंद रहने पर महारानी ने सोचा कि बिना खाए-पिए वह बढ़ई कैसे काम कर सकेगा।

ऐसे ईच्छा पूरी हुई सुभद्रा की 

अब तक वह जीवित भी होगा या मर गया होगा। महारानी ने महाराजा को अपनी सहज शंका से अवगत करवाया। महाराजा के द्वार खुलवाने पर वह वृद्ध बढ़ई कहीं नहीं मिला लेकिन उसके द्वारा अर्द्धनिर्मित श्री जगन्नाथ, सुभद्रा तथा बलराम की काष्ठ मूर्तियाँ वहाँ पर मिली।
महाराजा और महारानी दुखी हो उठे। लेकिन उसी क्षण दोनों ने आकाशवाणी सुनी, ‘व्यर्थ दु:खी मत हो, हम इसी रूप में रहना चाहते हैं मूर्तियों को द्रव्य आदि से पवित्र कर स्थापित करवा दो।’

आज भी वे अपूर्ण और अस्पष्ट मूर्तियाँ पुरुषोत्तम पुरी की रथ यात्रा और मन्दिर में सुशोभित व प्रतिष्ठित हैं। रथ यात्रा माता सुभद्रा के द्वारिका भ्रमण की इच्छा पूर्ण करने के उद्देश्य से श्रीकृष्ण और बलराम ने अलग रथों में बैठकर करवाई थी। माता सुभद्रा की नगर भ्रमण की स्मृति में यह रथयात्रा पुरी में हर वर्ष होती है।

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