बिहार से बराह क्षेत्र में बड़ी संख्या में कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर जाते है श्रद्धालु , जानिए क्या है महिमा?

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फारबिसगंज: कोशी जहां हिमालय की गोद से उतर कर जमीन पर उतरती है, वहीं पर नेपाल का बराह क्षेत्र में कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। भारत से सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण बिहार के कोशी और सीमांचल के बड़ी संख्या में श्रद्धालु पूजा करने और कोशी की पवित्र जल धारा में डुबकी लगाने जाते है। बराह क्षेत्र को हिन्दू धर्म में बहुत ही पवित्र माना गया है, भगवान विष्णु के तीसरे स्वरूप बराह अवतार के कारण इस क्षेत्र को पवित्र माना जाता है। कोशी जब हिमालय से धरती पर उतरती है, तब इसी क्षैत्र से होकर बीरपुर के रास्ते कोशी बैराज से भारत में प्रवेश करती है ।

भगवान विष्णु के तीसरे अवतार बराह रूप में विराजमान है ।

मान्यता है की जब हिरणाकश्यप ने पृथ्वी को लेजाकर समुद्र में छुपा दिया तब भगवान विष्णु बराह रूप में प्रकट हुए। इस स्वरूप को देखकर सभी देवताओं ने स्तुति की और उनके आग्रह पर भगवान विष्णु के तीसरे स्वरूप बराह अवतार ने पृथ्वी को ढूंढ़ने में मदद किया और समुन्द्र में जाकर अपने दातों पर पृथ्वी को रखकर बाहर ले आए। कोशी नदी के किनारे भगवान विष्णु का मंदिर है, जहां बराह रूप में भगवान विराजमान है। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर कोशी स्नान की परंपरा रही है, हिन्दू धर्म में हरिहर क्षेत्र, कुरु क्षेत्र, मुक्ति क्षेत्र और बराह क्षेत्र में सबसे पवित्र स्थल बराह क्षेत्र को माना गया है ।

बिहार से नेपाल के बराह क्षेत्र जाने का रास्ता ।

बिहार से बराह क्षेत्र जाने के लिए भारतीय सीमा भीमनगर बॉर्डर के बाद महेंद्र राजमार्ग होते हुए इटहरी की ओर जाने पर, करीब 20 किलोमीटर के बाद ही आता है झुनकी चौक। यहां से 6 किमी आगे चतरा के लिए नहर के किनारे सड़क बनी है़, उसके छह किलोमीटर बाद चतरा से ही कोसी नदी के साथ-साथ पहाड़ की चढ़ाई शुरू हो जाती है़। चार किलोमीटर तक करीब छह फीट संकरे पथरीले रास्ते से पैदल ही वराह क्षेत्र तक पहुंचा जा सकता है ।

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