मिथिला का इलाका जितना पांडित्य का है, उससे कहीं अधिक यौद्धाओं का : शंकरदेव

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दरभंगा । मिथिला का इलाका जितना पांडित्य का है, उससे कहीं अधिक यह इलाका यौद्धाओं का है। पांडित्य से राज पाने के बाद युद्ध के बल पर ही खंडवला राजवंश ने 400 साल से अधिक समय तक मिथिला पर राज किया है। उक्त् बातें इतिहसकार डॉ शंकरदेव झा ने शुक्रवार को स्थनीय गांधी सदन में आयोजित रासबिहारी लाल मंडल व्याख्यान देते हुए कही। खंडवलाकालीन मिथिला के युद्ध और यौद्धा विषय पर बोलते हुए डॉ झा ने कहा कि तिरहुत का इलाका केवल पांडित्य के लिए याद किया जाता है, जबकि मुख्यधारा के इतिहासकारों ने यहां के शौर्य को पूणत: नजरअंदाज किया है। डॉ झा ने कहा कि 1556 में पांडित्य के बल पर महेश ठाकुर को राज मिलने के बावजूद उनकी हैसियत चौधरी की थी, लेकिन युद्ध के बल पर राघव सिंह न केवल पूर्ण राजा का दर्जा पाया, बल्कि अकर से अकर राज किया। डॉ झा ने कहा कि लदारी और कंपर्दी के अलावा कई और युद्ध हुए, जो इस इलाके से लेकर अफगान सीमा तक जाकर तिरहुत की सेना ने लडी है। उन्होंने खास तौर पर कमलाकांत और उमानाथ झा बख्शी जैसे योद्धाओं का उल्लेख किया। डॉ झा ने बताया कि खंडवला राजवंश ने युद्ध को इतना ही महत्व दे रखा था कि ब्राहमण समेत सभी जाति धर्म के लोगों को युद्ध कला मे निपुर्ण होना अनिवार्य कर दिया था। यही कारण रहा कि तिरहुत की सेना में ब्राहमणों की संख्या अन्य जातियों के अनुपात में ही मिलती है। आचार्य रमानाथ झा हैरिटेज सीरीज के तहत आठवें व्याख्यान में मुख्य अतिथि ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ एसके सिंह ने कहा कि कहा कि मुख्य वक्ता का शोध पत्र काफी मेहनत से तैयार किया गया मिथिला का 450 साल का युद्ध एवं युद्ध के विषय में जानकारी अद्वितीय है, ऐसे गंभीर शोध पत्रों को आम जनमानस तक मिथिला से संबंध एवं शोधार्थियों को जानने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि इतिहास जिससे आम जनमानस को लगाव है और हरे क्षेत्र में इतिहास को जानना बेहद जरूरी है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि समर्पण रूप से किया गया हर एक शैक्षणिक कार्य लोगों के लिए मार्गदर्शन बनता है। जिस प्रकार मिथिला के इतिहास और युद्ध युद्ध की जानकारी मुख्य वक्ता के द्वारा दी गई है यह सही मायने में आज के युवाओं को जानना अति आवश्यक है क्योंकि अगर हम अपने देश राज्य के विषय में विशेष जानकारी प्राप्त नहीं करते हैं तो यह सही रूप से ज्ञान की प्राप्ति नहीं होगी। अपने अध्यक्षीय भाषण में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी गजानन मिश्र ने कहा कि पलासी से पहले बंगाल जीतने के लिए तिरहुत को जीतना जरुरी होता था। ऐसे में तिरहुत के राजाओं को अफगान और नेपाली आक्रमण तक झेलना पडता था। यहां छोटे-छोटे कई युद्ध होते रहे हैं। बडे युद्ध की संख्यान कम रही है। झा ने कहा कि खंडवला से पूर्व भी यह इलाका युद्ध इतिहास से भरा हुआ है। कर्नाट और ओइनिवार राजवंश का जिक्र करते हुए उन्होंने दरभंगा के सामरिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने भी माना कि इतिहासकारों ने मिथिला के शौर्य और यौद्धाओं उनकी उपेक्षा की है।
इससे पूर्व इ’समाद फाउंडेशन के न्यासी और कार्यक्रम के संयोजक संतोष कुमार ने आगत अतिथियों का स्वाागत करते हुए मिथिला के शेर कहे जानेवाले मुरहो के जमींदार और यादव महासभा के अध्यक्ष रासबिहार लाल मंडल के संबंध में लोगों को जानकारी दी। धन्यवाद ज्ञापन इ’समाद के प्रबंध न्यासी सुनील कुमार ने किया, जबकि मंच का संचालन संतोष कुमार ने की। कार्यक्रम में बीएड नियमित के विभागाध्यक्ष डॉ अरविंद कुमार मिलन, मधुबनी के प्रसिद्ध साहित्यकार अमल झा, डॉ अवनींद्र कुमार झा, लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय से चंद्रप्रकाश, सुशांत भास्कर, मुरारी मोहन झा, विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र अध्यक्ष सूरज कुमार, फवाद गजाली, मंजर सुलेमान, गरीब नाथ राय, धीरा झा आदि मौजूद थे।

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