आज एलएमएनयू होगा 46 साल का, जानिए इसके स्थापना में हुए संघर्ष की कहानी इन खूबसूरत तस्वीरों के माध्यम से।

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दरभंगा का एलएमएनयू यानी ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटी आज रविवार को पूरे 46 साल का ही जायेगा। आज के ही दिन 5 अगस्त 1972 में इस यूनिवर्सिटी की स्थापना की गई थी। पहले ये विश्वविद्यालय दरभंगा के मोहनपुर हाउस सारामोहम्मदपुर में चलता था।

ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटी का इतिहास जाने

मिथिला यूनिवर्सिटी जैसा अब दिखता है वैसा ये इसकी शुरुवात से नही था। ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के निर्माण में संघर्ष और विकाश का समृद्ध इतिहास रहा है।

ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय का इतिहास स्वतंत्रता के समय से शुरू होता हैं। मिथिला विश्वविद्यालय को धरातल पे लाने के लिए कुछ अकादमीयो और विद्वानों जैसे डॉ अमरनाथ झा,डॉ सुनील कुमार चटर्जी,डॉ आर सी मजूमदार और कई अन्य लोगो का कठोर और संघर्ष भर प्रयास था। डॉ अमरनाथ झा जैसे प्रभावशाली लोग मिथिला छेत्र के दिल दरभंगा में विश्वविद्यालय के स्थापना के लिए बढ़ती मांग की आवाज का नेतृत्व कर रहे थे। उनके प्रयास को समाज के अन्य प्रभावशाली लोगों वे द्वारा अच्छी तरह से समर्थन मिला था।

स्वतंत्रता समय से ठीक पहले 27 जनवरी 1947(वसंत पंचमी के सुबह दिन) पर सरकारी मिथिला विश्वविद्यालय समिति का एक आधुनिक विश्वविद्यालय की स्थापना की मांग के लिए गठन हुआ। डॉ अमरनाथ झा को जहा उस समिति का अध्यक्ष चुना गया वही पंडित गिरीन्द्र मोहन मिश्रा और पंडित गंगाधर मिश्र को उपाध्यक्ष चुना गया। जबकि अन्य लोग जैसे हरिनाथ मिश्रा को महासचिव वही कुमार कल्याण लाल और प्रोफ़ेसर कासिम हुसैन को सचिव चुना गया। श्री पद्मनन्दि को खजांची बाबाने के साथ ही साथ अन्य गणमान्य व्यक्ति जैसे श्री ज्योति प्रसाद सिंह,स्वर्गीय पी एनईशर और प्राचार्य बी एम सिन्हा इस खास समिति की सोभा बढ़ा रहे थे।

हालांकि मिथिला विश्वविद्यालय समिति अपना काम बखूबी कर रही थी,पर असली सफलता 1968 में आई थी। 1968 में यूजीसी टीम ने आधुनिक बहु-संकाय विश्वविद्यालय की स्थापना की संभावनाओं का पता लगाने के लिए दौरे पे दरभंगा आयी। दौरा के दौरान यूजीसी टीम ने राज्य सरकार से एक समिति आया गठन करने को कहा जिससे द्वारा दरभंगा में बहु-संकाय आधुनिक विश्वविद्यालय की अकादमिक और प्रशासनिक जांच की जा सके। समिति ने बताया कि योग्यता वे आधार पर स्वतंत्र और आधुनिक विश्वविद्यालय की स्थापना दरभंगा में संभव है।

मिथिला विश्वविद्यालय का गठन

अंततः केंद्रीय समिति की सिफारिश पर,मिथिला विश्वविद्यालय को दरभंगा में स्वतंत्र और बहू-संकाय के रूप में गठित किया गया था। 1972 के अध्यादेश के तहत ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय की स्तगपन की एक लंबी इच्छा थी।

मिथिला विश्वविद्यालय के कॉलेज बिहार विश्वविद्यालय मुज़फ़्फ़रपुर और भागलपुर विश्वविद्यालय भागलपुर के तत्कालीन दो विश्वविद्यालय से आकार दिए गए थे। मिथिला विश्वविद्यालय के कॉलेज दो विभागों में दरभंगा डिवीज़न और कोसी डिवीज़न में स्थापित किये गए थे। जबकि कोसी डिवीज़न जो मिथिला विश्वविद्यालय ले पहले हिस्से में था,को बाद में बीएन मंडल विश्वविद्यालय मधेपुरा का हिस्सा बन गया।

मिथिला विश्वविद्यालय से ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय तक का सफर

1975 में,ललित नारायण मिश्रा के अचानक समस्तीपुर में निधन के बाद मिथिला विश्वविद्यालय का नाम बदलकर ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय रखा गया। मरने से पहले ललित नारायण मिश्रा भारत सरकार के रेल मंत्री थे। बहुत जल्द इसे मिथिला विश्वविद्यालय में एक अध्यादेश द्वारा वापिस कर दिया गया था। हालांकि बाद में मिथिला विश्वविद्यालय को 1980 में एक अन्य अध्यादेश द्वारा ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में बहाल कर दिया गया था। तब से मिथिला विश्वविद्यालय छात्रों के बीच ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के रूप में जाना जाने लगा।

1986 में विश्वविद्यालय को मिली बड़ी सफलता

वर्ष 1986 ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के लिए एक ऐतिहासिक साल था जब विश्वविद्यालय को धारा 12ए के तहत यूजीसी से मान्यता मिल गयी। अब विश्वविद्यालय ने यूजीसी और सरकार के निरंतर समर्थन व सहायता से परिसर के विकास की गति में वृद्धि की। अब ललित नारायण विश्वविद्यालय बिहार सरकार के कुलित संस्थानों में से एक है।

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