दरभंगा जंक्शन स्थित हेरिटेज इंजन पर तेजी से कार्य जारी, रिमाडलिंग कर लाया जायेगा पुराने स्वरूप मे

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दरभंगा: स्टीम रेल इंजन का सफर आज भी लोगों को दीवाना बनता हैं, इन का सफर सुहाने लम्हों जैसा होता हैं। इसी दिवानगी को देख कई जगह पूराने स्टीम इंजनों को रिस्टोर कर पटरियों पर उतारा गया हैं, तो कई जगह इन्हें संग्रहालय मे संरक्षित भी किया गया हैं। ऐसे ही एक ऐतिहासिक इंजन को दरभंगा में लाकर उसके निर्माण काल के स्वरूप मे लाने का काम जोरों से जारी है।

क्यो है खास दरभंगा आया हेरिटेज इंजन 253

दरभंगा शहर के केंद्र मे स्थिति रेलवे जंक्शन की शोभा बढ़ाने को हाल में ही यहाँ 105 साल पुराने इंजन को स्थापित किया गया है, यह इंजन अपने आप में खास और दुर्लभ हैं। इग्लैंड से भारत आने के साथ ही इसने तिरहुत रेलवे और तिरहुत के औद्योगिक क्रांति को बनते बिगड़ते देखा हैं। भारतीय रेल के एकीकरण से पहले और बाद के अनुभवों को समेटा यह इंजन तिरहुत और दरभंगा के बहुमूल्य धरोहरों में से एक हैं।

मालूम हो की यह इंजन 1913 मे इंग्लैंड मे बनाया गया था और 1914 मे दरभंगा के तिरहुत रेलवे के अंतर्गत भारत आया। 1994 तक इसने मुख्य रेल मार्ग के साथ लोहट के चीनी मिल से चीनी का स्वाद भारत के विभिन्न क्षेत्रों तक पहुँचाया। चीनी मिल के विस्तार मे इसकी बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका थी। तिरहुत रेलवे के अंतर्गत ना सिर्फ तिरहुत और आसपास पटरियों का विस्तार हुआ, बल्कि रेलवे की पटरियां कारखानों तक भी पहुँची।

लोहट के शेड मे खड़ा इंजन अब दर्शायेगा दरभंगा की विरासत

चीनी मिल के बंद होने के बाद 22 वर्षों तक यह लोहट मिल के शेड मे पड़े रहने के बाद, मिल के घने जंगलों से इंजन निकाल कर दरभंगा आ चुका हैं। फिलहाल इसे पुराने स्वरूप मे लाने का काम शुरू हो गया हैं, जिसके बाद इंजन के नीचे पटरी तो पास में मीटर गेज काल की सिगंनल इस इंजन के आसपास आपको वाष्प इंजनों की दुनिया को ऐहसास करायेंगी। साथ ही रेलवे की इस इंजन के आसपास तिरहुत रेलवे और इसके मुख्यालय के इतिहास को भी दर्शाने की योजना हैं। फिलहाल इंजन को पुराने अवस्था में लाने का काम चालू है, जो जल्द पूरा कर लिया जायेगा।

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